लक्ष्मीनाथ गोसाईं ने मिथिला में रोक दिया था ईसाई प्रचार-प्रसार का रथ – डॉ कुलानन्दझा

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लक्ष्मीनाथ गोसाईं ने मिथिला में रोक दिया था ईसाई प्रचार-प्रसार का रथ – डॉ कुलानन्द झा

बिहार सहरसा – मिथिला की धरती न केवल अपने वैदुष्य परंपरा के लिये ख्यात है बल्कि अपने ज्ञान, धर्म और शक्ति‍ के बल पर इसने भारत वर्ष में अपनी पताका लहराई है। मिथिला में जब अंग्रेजों का आवागमन हुआ तो उन्होंने अपने क्षेत्र विस्तार के साथ-साथ उन्होनें अपने धर्म का भी विस्तार करना शुरू किया । इसके लिये उन्होंने मिशनरी की स्थापना की और जबरण अपना धर्म लोगों पर थोपना शुरू कर दिया, लेकिन उस समय प्रदेश के अन्य क्षेत्रों की तरह मिथिला ने भी इसका पुरजोर विरोध किया । और अपने भक्ति पदों के माध्यम से मिथिला के धर्म-ध्वज को कभी नीचे नहीं गिरने दिया । मिथिला में ऐसे ही एक संत हुए संत शिरोमणि‍ लक्ष्मीनाथ गोसाईं जी, जो अपने भक्ति पदों के माध्यम से अंग्रेजो के ईसाई धर्म के प्रचार में अवरोधक बनकर खड़ हुए । उक्त बातें शिम्मर फिल्मस इंटरनेशल द्वारा आयोजित विशेष परिचर्चा ‘आउ बाबाजी के जानी’ को संबोधि‍त करते हुए सहरसा के लब्धप्रतिष्ठिं‍त विद्वान डॉ कुलानन्द झा ने कही ।डॉ झा ने संत शिरोमणि लक्ष्मीनाथ गोसाईं के जीवन और कृतित्व पर विस्तार से चर्चा करते हुए बाबाजी को आशु कवि बतलाया । उन्होंने कहा कि बचपन से गोसाईं जी ने योग को साधना शुरू कर दिया था । गृहस्थ घर में पैदा लेने के कारण श्री कृष्ण की तरह बचपन में जब गाय चराने जाते थे तो अपनी लीलाओं से अपने साथियों को विस्मृ‍त कर देते थे । कभी पेड़ पर दिन भर उल्टा लटकना हो या नदी में में घंटो डुबकी लगाकर रहना । इन लीलाओं के बीच-बीच में ही वो छोटे-छोटे पद की रचना कर अपने साथियों को सुनाते और उन्हे चमत्कृत कर देते । इस तरह बचपन से ही उस अलौकिक बालक की चर्चा पुरे क्षेत्र में होने लगी थी ।

                          डॉ कुलानन्द झा

थोड़े बड़े हुए तो वर्तमान नेपाल के प्रान्त में जाकर शिक्षा लीं । नेपाल के ही पशुपति नाथ यात्रा के दौरान इन्हे गुरू गोरखनाथ से योग विद्या सीखने का सुअवसर प्राप्त हुआ । साथ ही साथ अन्ये विद्वतजनों के सानिध्य और आशीर्वाद से भी इन्हे अनंत ज्ञान की प्राप्ति हुई । ज्ञान प्राप्त कर जब यह पुन: मिथिला लौटें तो अपने भक्ति ‍गीतों के माध्यम से लोगों को चमत्कृ त और विभोर करते रहें । 85 वर्ष की अवस्था में सन 1872 ई0 में आप इस लोक को छोड़कर गौलोक चले गएं । लेकिन किवंदति है कि बाबाजी अभी भी बनगाँव स्थित अपनी कुटिया में निवास करते हैं । श्री बाबाजी आज भी यहाँ के प्रत्येक जनमानस के हृदय में बसते हैं । बाबाजी ने कोसी प्रक्षेत्र और भूपेन्द्र2 नारायण मंडल विश्वाविद्याल के प्रतिष्ठा को भी बढ़ाने का काम किया है । देश-विदेश में आज बाबाजी के भक्ति ‍ गीतों को लोग बड़ी श्रद्धा से सुनते हैं और गाते हैं ।

बता दें कि शिम्मर फिल्मस इंटरनेशनल द्वारा प्रत्येँक रविवार को संध्या 5 बजे से ‘आउ बाबाजी के जानी’ नाम से एक विशेष सत्र का आयोजन शुरू हुआ है जो लगातार जारी रहेगा । इस कड़ी में कुलानन्द बाबू पहले विद्वान थे जिन्होंने बाबाजी पर अपने सम्यक ज्ञान की प्रस्तुति‍ से श्रोताओं को विभोर कर दिया । यह श्रृंखला आगे भी लब्धप्रतिष्ठित विद्वानों द्वारा जारी रहेगी ।
कार्यक्रम में अपने ओजपुर्ण और सारगर्भित व्यागख्याुन के लिये पीजी सेंटर सहरसा के मैथिली विभाग के अध्यक्ष प्रो0 रंजीत कुमार सिंह, प्रो रामनरेश सिंह, डॉ रमणकान्त चौधरी, डॉ नरेन्द्र झा, प्रो0 अर्चना कुमारी, डॉ पुष्पा कुमारी, प्रो0 ऐ0 के0 ठाकुर, डॉ रेणु कुमारी, डॉ अंशु कुमारी, डॉ अवनीन्द्र झा, प्रो0 सुनिल कुमार सिंह आदि कतिपय विद्वानों ने डॉ कुलानन्द बाबू का आभार व्यक्त किया है । नेपाल के भी कतिपय साहित्यकारों ने बाबाजी पर इस अद्भुत विद्वत चर्चा के लिये डॉ झा का आभार जताया है तथा भविष्य में इस विषय पर विशद चर्चा का अनुरोध किया है ।

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